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पितर देते आशीष


विषय - पितृ पक्ष
शीर्षक - पितर देते आशीष
विधा - कविता
लेखिका - अनिला द्विवेदी तिवारी




जीवित पितरों को ना पूजते, मरने पर करते सोलह श्राद्ध! 
जीवित रहते ना मिले पूर्वजों को मांड! (पके चावल का पानी)
मरने पर परोसा जाए उन्हें खांड! (गुड़, मिष्ठान)
कैसी है यह रीति और कैसा है यह व्यवहार?
मरने के बाद ही क्यों लुटाते हैं लोग  सारा प्यार?
आयी हैं, पितृ पक्ष की वो सोलह श्राद्ध!
कौए, कुत्ते भी जिमाए जायेंगे, मानकर आराध्य!
लोग करते हैं इसमें अपने पितरों का तर्पण!
उनको करते छप्पन भोग और नैवेद्य का अर्पण!
काश यही अपनापन जीते जी भी दिखा लिया होता!
माता-पिता को वृद्धाश्रम की शरण में ना जाने दिया होता!
नहीं मांगते वो छप्पन भोग, उन्हें चाहिए दो वक्त की रोटी!
मीठे दो बोल उनसे कोई बात करे, और दे दो, तन ढकने को लंगोटी! 
दो मीठे बोल के बदले, पितर देते जी भर के आशीष!
कुछ नहीं जाएगा तुम्हारा, यदि तुम उन्हें नवा दोगे अपना शीश!


स्वरचित
©अनिला द्विवेदी तिवारी
जबलपुर मध्यप्रदेश

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8 Comments

बेहतरीन और यथार्थ चित्रण

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Mohammed urooj khan

29-Jan-2024 02:06 PM

👌🏾👌🏾👌🏾👌🏾

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Varsha_Upadhyay

28-Jan-2024 05:39 PM

Nice

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